उत्तराखंड

हिमालय केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि एक जीवंत रणनीतिक प्रणाली है: राज्यपाल ले. जनरल गुरमीत सिंह (से नि)

मध्य सेक्टर में सुरक्षा सुदृढ़ीकरण के लिए सैन्य, नागरिक प्रशासन और समाज के समन्वय पर राज्यपाल का जोर

देहरादून | इंडिया7लाइव

उत्तराखण्ड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने कहा कि हिमालय केवल एक प्राकृतिक या भौगोलिक सीमा नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत रणनीतिक प्रणाली है, जहाँ भू-आकृति, आधारभूत संरचना, जनसंख्या, शासन और सैन्य क्षमता निरंतर परस्पर क्रिया में रहती हैं।

राज्यपाल मंगलवार को क्लेमेंटटाउन, देहरादून में “फोर्टिफाइंग द हिमालयाजः ए प्रोएक्टिव मिलिट्री–सिविल–सोसाइटी फ्यूजन स्ट्रेटजी इन द मिडिल सेक्टर” विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि यद्यपि भारत–चीन सीमा के मध्य सेक्टर को परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत शांत माना जाता रहा है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियाँ सतत सतर्कता और पूर्व तैयारी की मांग करती हैं। हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए सैन्य बलों, नागरिक प्रशासन और समाज के बीच प्रभावी समन्वय अत्यंत आवश्यक है।

राज्यपाल ने कहा कि आज की सुरक्षा चुनौतियाँ केवल प्रत्यक्ष सैन्य गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हाइब्रिड वारफेयर, ग्रे-जोन गतिविधियाँ, द्वि-उपयोगी अवसंरचना और सीमावर्ती क्षेत्रों में निरंतर दबाव जैसे कारकों से भी आकार ले रही हैं। ऐसे में हिमालयी क्षेत्र की दीर्घकालिक सुरक्षा सैन्य तैयारियों के साथ-साथ नागरिक प्रशासन, स्थानीय समुदायों और आधुनिक प्रौद्योगिकी के समन्वय से ही सुनिश्चित की जा सकती है।

सीमावर्ती गांवों को राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम स्तंभ बताते हुए राज्यपाल ने कहा कि स्थानीय नागरिक केवल योजनाओं के लाभार्थी नहीं, बल्कि सीमा सुरक्षा के सहभागी और बलवर्धक हैं। उन्होंने ‘वाइब्रेंट विलेज’ कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ-साथ जनसंख्या स्थिरता, लॉजिस्टिक मजबूती और सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थायी राष्ट्रीय उपस्थिति को भी सशक्त करता है।

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आधारभूत संरचना की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सड़कें, सुरंगें, पुल, हवाई संपर्क और दूरसंचार सुविधाएँ परिचालन तत्परता के अनिवार्य घटक हैं। चारधाम परियोजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह न केवल तीर्थाटन और आपदा प्रबंधन को सुदृढ़ बनाती है, बल्कि रणनीतिक गतिशीलता और सुरक्षा तैयारियों को भी मजबूती देती है।

आधुनिक तकनीक के महत्व को रेखांकित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि ड्रोन, उन्नत निगरानी प्रणालियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्लेटफॉर्म परिस्थितिजन्य जागरूकता और त्वरित प्रतिक्रिया में सहायक हैं, लेकिन तकनीक नेतृत्व, विवेक और संस्थागत मजबूती का विकल्प नहीं हो सकती।

उन्होंने पर्यावरण संतुलन को भी परिचालन क्षमता से जोड़ते हुए कहा कि पर्यावरणीय क्षरण से जीवन, आजीविका, लॉजिस्टिक्स, संचार और आपदा प्रबंधन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा आवश्यकताओं के बीच संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर उन्होंने विशेष बल दिया।

राज्यपाल ने कहा कि हिमालयी सीमाओं की वास्तविक शक्ति शांत तैयारी, संस्थागत समन्वय और सामाजिक विश्वास में निहित है। जब सैन्य बल, नागरिक प्रशासन और समाज एकजुट होकर कार्य करते हैं, तब हिमालयी सीमाएँ अधिक सुदृढ़, स्थिर और सुरक्षित बनती हैं।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, आधारभूत संरचना के सुदृढ़ीकरण और सैन्य-नागरिक समन्वय जैसे विषयों पर इस प्रकार का सेमिनार अत्यंत महत्वपूर्ण है। सेमिनार से प्राप्त सुझाव सामरिक नीति को मजबूत करने के साथ-साथ हिमालयी क्षेत्र के समग्र विकास में भी सहायक होंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित जनसंख्या जैसी चुनौतियों को देखते हुए सेना, नागरिकों, सिविल प्रशासन और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नागरिक देश की सबसे बड़ी शक्ति हैं, जो राष्ट्र की आँख और कान बनकर राष्ट्रीय सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम का उल्लेख करते हुए कहा कि सीमांत गांवों के विकास और सशक्तिकरण की दिशा में ठोस कार्य किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री द्वारा सीमांत गांव माणा को ‘देश का अंतिम गांव’ नहीं बल्कि ‘देश का प्रथम गांव’ बताए जाने को उन्होंने ऐतिहासिक पहल बताया।

इस अवसर पर जीओसी-इन-सी, सेंट्रल कमांड लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता ने मध्य सेक्टर की सीमाओं से जुड़ी चुनौतियों, नागरिक समाज के सशक्तीकरण, तकनीकी उन्नयन और अवसंरचनात्मक विकास पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम में राजदूत श्री अशोक के. कांथा (सेवानिवृत्त), ब्रिगेडियर अंशुमान नारंग (सेवानिवृत्त), लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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